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Saturday, May 8, 2010

माँ


माँ
परमपिता के ध्यान में टिके न लाख टिकाये।
माँ की ममता में मगर मन आनन्द मनाये

होने को भगवान भी, बड़ी कौन सी बात।
“माँ होना” भगवान की भी पर नहीं बिसात॥

मन से किस सूरत हटी मूरत माँ की बोल।
बच्चे से बूड़े हुए माँ फिर भी अनमोल॥

दूह दूह कर स्वयं को किया हमें मजबूत।
कैसे माँ के दूध का कर्ज़ उतारें पूत॥

माँ की ममता की अरे समता नाही कोय।
क्षमता माँ की क्या कहूँ प्रभु भी गर्भ में सोय॥

अनुपमा माँ


अनुपमा माँ !
सात समुद्रों से भी ज्यादा
तेरे आँचल में ममता है।
देखी हमने सारे जग में,
ना तेरी कोई समता है॥

सौम्य सुमन सरसिज के हरसें
सरसें स्नेह सरोवर नाना।
सुप्रभात की अनुपमा सुषमा,
सदा चाहती है विकसाना॥
सुधा स्पर्श सा सुन्दर शीतल
सुखद श्वास प्रश्वास सुहाना।
कल्पशाख से वरद सुकोमल
कर अभिनव मृणाल उपमाना॥
स्वर्ग और अपवर्ग सभी कुछ,
माँ की गोदी में रमता है॥

हो शुचि रुचि पावन चरणों में,
तेरा करूँ चिरन्तन चिन्तन।
शीश चढ़ा दूँ मैं अर्चन में,
अर्पित कर लोहू का कण कण॥
मणिमय हिमकिरीटिनी हेमा
माँग रहे वर तव सेवक जन।
शुभ्रज्योत्स्ना स्नात मात तव
वत्स करें शत शत शुभ-वंदन॥
सप्त सिन्धु का ज्वार तुम्हारे
पद पद्मों को छू थमता है॥

Sunday, September 13, 2009

हिंदी दिवस की शुभकामनाय़ें



भारतमाता के भव्यभाल की है बिन्दी हिंदी
पहचान आन बान शान स्वाभिमान है।
न्यारी प्राणप्यारी प्रजा सारी बलिहारी भव्य-
भाषा है हमारी दिव्य-देश हिंदुस्तान है॥
चमाचम चमकेगी चारु चंद्रिका सी शुचि
रुचिरा गंभीरा गिरा गरिमा महान है।
देवभाषा सुता भद्रभाव भूषिता है हिन्दी
होनी विश्वभाषा अरे दीप का ऐलान है॥२॥

नहीं मात्रभाषा बल्कि मेरी मातृभाषा प्यारी
हिंदी हिंदुस्तान का हृदय हुलसाती है॥
खुसरो अमीर खानखाना वो अब्दुर्रहीम
सूर तुलसी कबीर काव्य कुल थाती है॥
भूषण भणे हैं इसी भाषा में कमाल लाल
छ्त्रसाल-यश, शिवा-बावनी गुँजाती है॥
खड़ीबोली लल्लूलाल भारतेंदु से निखर
विश्वभाषा बन रोम रोम पुलकाती है॥१॥

Wednesday, September 2, 2009

राष्ट्रभाषा गान

राष्ट्रभाषा गान

जय जय हृदय हुलासिनी हिंदी
विश्वविकासिनीभाषा
अभिलाषा अखिल राष्ट्र भारत की
नित्यनवलपरिभाषा
कल्याणि! वाणी नव आशा
जननि! जन्मभूभाषा।
तव स्वाध्याय से जागें
सब उन्नति पथ लागें
गायें तव गुणगाथा
जन गण मन उल्लासिनीहिंदी
सरल सुभाषिणी भाषा
जय हे! जय हे! जय हे!
जय जय जय जय हे!!

Thursday, February 12, 2009

गर्म अश्कों में जल रही होंगी

गर्म अश्कों में जल रही होंगी,
सुर्ख़ आँखें पिघल रही होंगी।
ले मिलन की नवीन उम्मीदें,
आहें दिल से निकल रही होंगी॥

नज़र से वो सभी की बच बचके,
मुँह गीले सिरहाने पै रख के।
पड़ीं होंगी जुदाई में तनहा,
सिसकियाँ उनकी चल रही होंगी॥

सर्द रातों में ठंडे बिस्तर पर
सोईं होंगी भला कहाँ पलभर।
सिलवटें करवटें बदलने से
बिछौने में उभर रही होंगी॥

मिलन की रात के सुहाने पल
याद कर होएँगी कभी विह्वल।
अँधेरे में मधुर होठों की पाँखुर,
विकल खुद ही मसल रही होंगी।

हमारी ले छवि खयालों में
अँगुलियाँ वो सुनहरे बालों में।
कभी गोरे गुलाबी गालों में
छुआ छुआ सिहर रही होंगी॥

Wednesday, February 4, 2009

मानस पुत्री कविता



मूर्त्त अमूर्त्त चराचर जग के चित्र विचित्र स्वतः चित्रित हों।
चचंल चलचित्रों की भाँति भाव चित्र जब एकत्रित हों॥
मनस पटल पर प्रगट तभी मानसपुत्री कविता होती है।
क्रांतदर्शी कवि के सुवर्णमय सृजन गर्भ में यह सोती है॥

सुचिर रुचिर नवरस संयुक्ता उत्तम ध्वनिपद-अवली युक्ता,
छ्न्दशैली गुणरीति अनूठी सृष्टि नियम से बिल्कुल मुक्ता।
व्यष्टि
व्यष्टि में व्यक्त समष्टि कविता के द्वारा होती है,
सदा मंत्र दृष्टा हृदयों में जगी जगी कविता ज्योती है॥

क्या है कविता की परिभाषा निश्चित क्या सविता की आशा,
अंतर्बाह्यजगत परिभाषित कैसे करे शब्द की भाषा॥
वेद पुराण काव्यग्रंथों में सदा काव्य-चर्चा होती है,
लेकिन क्या कवि मानस पुत्री कविता पुस्तक में सोती है।

यदि कविता को पाना है तो अपना हृदय टटोलो तुम,
कुण्डलियाँ गिरधर खोलेंगे मीरा से गर हो लो तुम॥
खुसरो तुलसी सूर कबीरा रहिमन के मन होती है ,
कविता ब्रह्मानंद से बढ़िया प्रेम बीज मन बोती है॥

कविता तो है भूखे नंगेभिखमंगों की खोली में,
कविता तो हर देशभक्त के लाल लहू में गोली में॥
सघन जघनकच कुच कलशों पर जिनकी कविता होती है।
उनके देश की आने वाली पीढ़ी सदियों रोती है॥
















Saturday, January 31, 2009

आन्दोलन आँधी सा गजब उठाता गाँधी॥

सत्य अहिंसा मूलमंत्र उद्‍गाता गाँधी।
राष्ट्रप्रेम का यज्ञानल धधकाता गाँधी॥
अमरहुतात्मसपूतों में स्वातंत्र्यभाव भर
आन्दोलन आँधी सा गजब उठाता गाँधी॥

उन्नीस सौ इक्कीस ब्रिटिश सत्ता का पत्ता-
पत्ता तितर बितर हो गया गिरी महत्ता
सारी की सारी ही खो गई बुद्धिमत्ता
धू धू कर जल उठीं दुकानें कपड़ा लत्ता
ध्वस्त हो गया माल विदेशी पानी पत्ता।
नहीं आगरा दिल्ली बाम्बे या कलकत्ता।
झुलस गये लंदन तक के गोरे अलबत्ता
भाँप गये विद्रोह विकट भड़काता गाँधी

पुतली बाई की पुतली सा प्यारा प्यारा
कर्मचंद गाँधी के नैनो का उजियारा॥
तप: पूत अवधूत महात्मा गाँधी न्यारा।
मोहनदास करमचंद गाँधी बना हमारा।।
राष्ट्रपिता बापू भारत का हृदय दुलारा ।
जिसने तन मन धन जीवन सारा का सारा॥
वारा भारत माँ की आज़ादी हित वारा
गूँज रहा है हृदयों में उसका ही नारा
देशजातिसेवा की याद दिलाता गाँधी॥

Tuesday, January 20, 2009

मधुरिम मधुरिम हो लें

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

परिणय के धागे में प्रियतम प्रणय-प्रसून पिरो लें ।
मधु-मानस-मण्डप में अब हम मधुरिम-मधुरिम लें ।।

सस्वर मंत्रगान सा करते बन पर्जन्य-पुरोहित,
अभिमंत्रित अमृत वर्षण कर करते ताप तिरोहित ।
मधुर-मिलन के परम वचन हम सप्तपदी पर बोलें ।।

देखो हरित्‌ धरित्री पर अति हर्षित नील गगन है ,
क्षितिज पार आलिंगन करता कैसा मुदित मगन है ।
आओ हम भी बीज आज अद्वैत प्रेम का बो लें ।।

देख रही ये अपलक सुभगा ले हिय प्रिय उन्माद
मदिर मदिर ये अधर चाहते केवल प्रेम-प्रसाद ।
हीरक-हार हृदय सुन्दरतम हर अवगुण्ठन खोलें ।।

प्रेम धुर से जुड़ा जीवन धरम

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

केंद्र में स्वार्थ परिधि पै धरकर अहम्‌।
खींचना प्रेम का वृत्त केवल वहम।।

व्यास है वासना-पूर्ण-वृत्ति विकट।
होती संकीर्णता हाय हरेक प्रकट।।
चाप चुपचाप हा ! पापमय हैं धरे
चक्रवत्‌ घूमें - विक्षिप्त सब श्वान -सम।।

प्रेम-त्रिज्या बिना बिंदु बिंदु रहे
सिकता सिंधु में ना नाव बंधु बहे।
वक्र निष्ठुर शनि के वलय सी गति
हा! गति! वृत्त-जीवन गया है सहम।।

क्रोध से मोह और मोह से विस्मरण,
विस्मरण की वजह बुद्धि का अपहरण।
बुद्धि के अपहरण से मरण के करण
निम्नयोनि में और फिर जनम पर जनम।।

चलती चक्रारपंक्ति सी क्यूँ ज़िदगी,
मौत से जाती यूँ हार क्यूँ ज़िदगी।
सब का सब राज़ पूरा खुला आज है,
प्रेम धुर से जुड़ा सारा जीवन धरम।।

प्रेम की व्युत्पत्ति

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

मौन भाषा जटिल व्याकरण प्रेम का,
है बहुत ही कठिन आचरण प्रेम का।
कर लिया वासना ने हरण प्रेम का,
दिल की सच्चाई रोके क्षरण प्रेम का।

जब किसी से नयन चार होने लगें,
स्वप्न-संसार साकार होने लगें।
और खोने लगे दिल किसी के लिए
तब समझना नया अंकुरण प्रेम का।

तन से तन का मिलन तो क्षणिक खेल है,
मन से मन का मिलन ही सही मेल है।
मेल जब ये परम आत्मिक हो चले,
तब ही सजता है वातावरण प्रेम का।

प्रेम है एक तपस्या नहीं पर सरल,
प्रेम है हर समस्या का हल दरअसल।
कब कुटिल मन बना उद्धरण प्रेम का,
पालना है न आसान प्रण प्रेम का।

राह तलवार की धार-सी तेज है,
इसकी जहरीले काँटों भरी सेज है।
पाप से ढोंग से सख़्‍त परहेज़ है,
मत बढ़ा औ’ बुज़दिल चरण प्रेम का।।

प्रणय गीत

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
मन पंछी के कभी कल्पना पंखों को सहलाये,
बन कर कभी किरण आशा की अरुण नभस पर छाये।
स्वप्न-सुन्दरी सपनों में तू प्रेम सुधा बरसाये,
रचना गीत प्रणय के कविवर! कह मुझको उकसाये।।

कुंचित स्वर्ण केश अवगुंठन तेरे चंद्र वदन का,
यदि देख ले भरमा जाये चंदा नील गगन का।
इठलाये इतराये जब तू मन ही मन मुसकाये,
कामदेव का तरकस खाली तीरों से हो जाये।।

कोमल कमल करों में कंचन कामिनी कलश उठाकर,
छलक छलक छलकाकर मदिरा रूप मधुप मन भाकर।
नम्र पयोधर तृषित अधर धर नव उल्लास जगाये,
रोम रोम में प्यास प्रेम की तू अद्‌भुत भड़ाकाये।।

प्राण प्रिये सच! प्रण करता हूँ प्रणय गीत प्रणयन का,
रसिक बना ले पर मुझको तू निज सौंदर्य सुमन का।
गूँजे प्रणय गीत मेरा यति, गति, लय, सुर मिल जाये,
प्रेम ताल पै यदि झूम तू बाँहों में आ जाये।।

तुम्हारे प्यार से

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

पुर सकूँ होती है रुह मेरी तेरे दीदार से।
बन गये आँसू मेरे मोती, तुम्हारे प्यार से।।

मैं निष्ठुर तन्हाई के सूखे में व्याकुल था मगर।
तुम सघन-सावन-सरिस, बरसे सरस-रसधार-से।।

ज़िन्दगी मे छा रहा था इक अजब पतझार-सा।
आ खिलाये फूल खुशियों के बसंत बहार से।।

हम पुकारें तुमको क्या कहकर हमें बतलाइये।
लगते हो वैसे तो तुम मुझको मेरे संसार से।।

रोशनी कब तक अरे! रहती भला इस दीप की।
जल रहा यह "दीप" तेरे स्नेह के आधार से।।

जीवन में प्रेम संजीवन है

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

स्वर्णिम कुच कलशों पर कुंचित,
कच कामिनी क्यों लटकाती हो।
अलि युगल बना दौवारिक उर
गज गामिनी क्यों इठलाती हो।

सद्यःस्नाता तन्वी अनुपम
देह दामिनी क्यों दमकाती हो।
अभिलषित समागम यदि सुन्दर-
भ्रू भामिनी क्यों मटकाती हो॥

नव तरुणी तव अरुणाभ अधर
मधुरिम मधुरिम तरुणाए हैं।
कोमल कमनीय कमल कलि के
नव पाँखुर से अरुणाए हैं॥

पीने को प्रेम पराग रसिक
मन भ्रमर भाव अकुलाए हैं।
संस्पर्श सुखद सौवर्णी सुधा
चुम्बन को हम ललचाए हैं॥

सामीप्य समागम की वेला
में तन से तन आलिंगित हो।
मन मिलन मधुर हो रुचिर सुचिर
तादात्म्य परम का इंगित हो॥

कर लें आओ हम बीज वपन
आनन्द भुवि अनुप्राणित हो।
जीवन में प्रेम संजीवन है
जगती में स्वतः प्रमाणित हो॥

Sunday, January 18, 2009

अभिनन्दन

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

दिया नेक वारि-दान वट-द्रुम-दल-को औ,
गुरुकुल वाटिका जिलाये खूब हरि हैं।
हरियाली हरि-तृतीया है ये निराली अहो,
महिमा अनूठी दिखलायें खूब हरि हैं।।

काट छाँट डाले कोटि-कोटि कष्ट कण्टक हैं,
फूल खुशियों के ये खिलाये खूब हरि हैं।
सहृदय हृदय है हरि दर्श पाके ’दीप’
हरे हरि हरि से मिलाये खूब हरि हैं।।

हरि के इशारे बिना इस जहाँ में किसी के,
जीवन का नहीं चला स्यंदन है करता।
प्राणों का भी प्राण प्राणी पाते सभी त्राण हरि,
बिन कौन प्राणी यहाँ स्पन्दन करता।।

चन्द नहीं चन्दन है हरि भाव चन्दन है,
धूपदीप बिना ’दीप’ वन्दन है करता।
आनन्दित हो उठा है हरि दर्श पाके तव,
नन्दन सुमन अभिनन्दन है करता।।

"जवाँ भिखारिन-सी"

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

भूखी थी दुत्कार खा गई, और अनचाहा प्यार पा गई।
जवाँ भिखारिन बनी ज़िन्दगी कदम कदम पर मार खा गई।।

पेट पालने के चक्कर में पलने लगा पेट में कोई,
पल पल पीती घूँट जहर के भूखी प्यासी खोई खोई।
रोई चीखी सन्नाटों में गहरी-सी चीत्कार छा गई।।

जितने जिस्म बिके दुनिया में बदमाशों के बाज़ारों में
हाथों हाथ खरीदे रौंदे कुचले सब इज्जतदारों ने ।
आज शरीफों की महफिल में कहकर गश लाचार खा गई।।

नहीं भरोसा कुछ सांसों का, अरमानों की इन लाशों का,
बोझ नहीं अब उठता हाय! प्यासी से खाली ग्लासों का ।
पानी फिर भी झरे आँख से लगता फिर फटकार खा गई।।

कुत्ता! बापू की समाधि जा चढ़ा

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

भेड़िये ओसामा या सद्दाम-से,
देख घुस जाता है अपनी भाड़ में॥
भेड़ किंतु पाक भारत को समझ
हाँकने की नित रहे जुगाड़ में॥

भाड़े के हैं टट्टू इस पै बेशुमार
भीड़ को भुनवाये ये जालिम-जिग़र।
रोज़ तोपों से उजड़वाये हजारों
बंकरों का नाम ले मासूम घर॥
हर फटे बम में मिला बारूद इसका
हाथ इसका ही मिला हर राड़ में॥

कौन चँद करमों के कारण करमचंद
गाँधी मोहनदास की पुण्यस्थली॥
पर अपावन पाँव इसके पड़ गये
और न दहली हाय! बिल्कुल देहली॥
कर बहाना बम्ब का बेइज्जत किया।
क्यों अहिंसक बापू को खिलवाड़ में॥

सूँघ सब कमबख़्त! है आया वहाँ
खेल गंदा खेलने की ताड़ में॥
कुत्ता! बापू की समाधि जा चढ़ा,
हाय! अमरीकी सियासती आड़ में।
दरअसल हर एक कुत्ते की तरह
जी फँसा इसका भी सूखे हाड़ में॥

फुँफकारती कुण्डलियाँ

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

गूफ़लाल के गैंग में आ पहुँचे ब्लफलाल।
सोचा दोनों ने चलो हो लें मालामाल॥
हो लें मालामाल, काम छेड़ा फाईनेंसी।
नोट छापने लगे भई! अच्छी एजेंसी॥
धंधा अच्छा, गंदा है, कुछ ना किया खयाल
रेड़ पड़ी पकड़े गये गूफ़लाल ब्लफ़लाल।

चलाचला चक्की अकल गई जेल में जाग।
पछताये, खुद फोड़कर दोनों अपने भाग।।
दोनों अपने भाग, जगाने की सोची फिर।
नई गजब तरकीब एक सूझी थी आखिर॥
रिहा जेल से होते ही जा खोला मंदर।
बन बैठे परधान सिकटरी दोनों बंदर॥

अंधी जनता की खुली गाँठ मिली क्या खूब।
रोज मलाई मारते प्रभु आगे धरें दूब॥
प्रभु आगे धरें, दूब गूफ, ब्लफ़लाल निराले।
भाग – “रिया-सत” दे गये, पढ़ें लोग रिसाले॥
मौन “अभय-मुद्रा” धरी संत बन रहे आज।
दोनों की भगवान संग आरती करे समाज॥

सच्ची बात लगे बुरी

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

भोली सूरत नीयत बुरी।
मुँह में राम बगल में छुरी॥
ढोंगी बदलें काँचुरी।
चल सपनीली चातुरी॥

छाती पै ही दलते मूँग।
हर मछली पै मारें ठूँग॥
चक्का जाम किया भक्ति का
बगुले भक्त, हैं धर्मधुरी।

कुत्ते सब कुछ सूँघ रहे।
भगत आलसी ऊँघ रहे।
नहीं किसी को खबर कोई,
बजे चैन की बाँसुरी॥

जम जाते मंचों पै भाँड,
पी पी करके फ़ोरेन ब्रांड।
हरे खेत में जैसे सांड,
सच्ची बात लगे बुरी॥

भौंडे भजन फिलमिया धुन।
कान पक गये हैं सुन-सुन॥
धंधा है जागे की रात,
खुलें पर्स की पाँखुरी॥

अनुपमा

समझ घन चिलमन को चुपचाप,
आ छुपा चन्दा पूनम का।
प्रभा है दिव्य दामिनी सी,
अंग अंग दमका हमदम का।।

श्याम अलि कुल सा केश कलाप,
मदन के चाप सदृश भ्रू चाप।
झील से नील नयन नत आप,
कोकिला कण्ठ मधुर आलाप,
लसे शुक चंचु सम नासा,
रूप अनुपम है प्रियतम का।।

गले में मुक्ता मणि की माल,
होंठ ये बिम्बाफल से लाल।
सुकोमल कर ज्यों कमल मृणाल,
डालते मुझपे मोहक जाल।।
नहीं मालूम मुझे ये स्पर्श,
सनम का है या शबनम का।।