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Tuesday, March 31, 2009

मसीहा:आचार्य संदीप त्यागी


साज ही न बजता जिस पै ,वो भी कोई वीणा है,
जिसमें ना चमक हो कोई,वो भी क्या नगीना है।
क्या जतन बिना भी मनुवा जीना कोई जीना है।।

पगले नाम जिन्दगी ना ऐश औ आराम का,
मस्ती भरी सुबहा का, ना रंगीली शाम का।
असलियत में जिंदगी तो खून औ पसीना है।।

तिनका तिनका जोड़कर पंछी भी घर बनाते हैं,
दौड़ धूप करके दिन भर दाना पानी पाते हैं।
तूने हक मगर क्यों हाय दूसरों का छीना है।।

झंझटों को झेलकर भी हँसते हँसते जीते जो,
बांट कर सभी को अमृत खुद जहर हैं पीते जो।
कहता जग मसीहा उनको भूलता कभी ना है।।

Wednesday, March 25, 2009

हे ईश !




हे ईश!तेरी याद में सब कुछ भुला दिया।
महिमा ने तेरी मनसुमन मेरा खिला दिया॥

पाने को तुझको उम्र भर ढूंढा कहाँ नहीं।
रहता तू जर्रे जर्रे में फिर क्यों मिला नहीं।।
बस लेके नाम ही तेरा जीवन बिता दिया.......


तूफान आँधी में सदा ’संदीप‘ ये जला ।
बीहड़ अँधेरी राह में हरदम है ये चला ॥
पाने को तेरा आसरा खुद को मिटा दिया.....

Tuesday, January 20, 2009

राम का नाम ले

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
खुमारी अद्‌भुत चढ़ाये जाम ले।
खुशी से झूम झूम मचा धूमधाम ले॥
सुबह ले शाम ले शाम ले या आठों याम ले,
राम के नाम का जाम तू थाम ले॥
साध सब काम ले, राम का नाम ले॥

राम नाम की पी पी मदिरा, मस्त-मस्त मुनिजन देखे,
बाल्मिकी तुलसी कबीर आदि से सुधी सन्तन देखे।
चढ़ा चढ़ाकर यही सुराही सुरपुर में सुरगण देखे,
देखें हैं आबाल-वृद्ध समृद्ध सभी जनमन देखे॥
उलटे-सीधे, सीधे-उलटे हो जैसे ले नाम ले॥

राम नाम के नशे-नशे में लाँघ लिये हनुमन्‌ सागर,
लंकिनी, त्रिजटा, सुरसा-मुख भी लगी रामरस की गागर।
भक्त विभीषण से जा बोले प्याला तू भी थाम ले,
तर जायेगा बंधु अवश्यम्‌ पी रस नाम ललाम ले।
सिय सुध पाई लंका जलाई रामदूत ने नाम ले॥

माँ! शारदे तुमको नमन

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
शारदे तुमको नमन माँ, शारदे तुमको नमन।
श्वेत हिम-वसने अनुपमे शरद ऋतु सम सुखसदन॥

शुभ्र शोभा रजत वर्णी स्वर्ण पर्णी सौख्यदा।
सार हो संसार का हे शारदे अशरण – शरण॥

तव वल्लकी का नाद अनह्द गूँजता अविराम है।
कर रहा झँकृत मेरे उर तार को जिसका श्रवण॥

काव्य की तुम प्रेरणा आधार जीवन का तुम्हीं।
हो स्वर मेरे संगीत का पीयूष का ज्यों आचमन॥

हूँ अकिंचन “दीप” अति मैं क्या करूँ तुमको समर्पित।
बस हृदय की वाटिका के भेंट ये श्रद्धा-सुमन॥

तेरी मर्जी

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

उधर ही चलेंगे जिधर ले चले तू।
हमें इससे क्या कि किधर ले चले तू॥

सही ले चले तू गलत ले चले तू।
न हो तेरी मर्जी तो मत ले चले तू॥

नहीं ना नुकुर या कोई नाज नख़रा।
करेंगे कभी जिस डगर ले चले तू॥

पड़े बस रहेंगे यूँहि तेरे दर पर।
जो दर दर की ठोकर में सर ले चले तू॥

जमीं से जहन्नुम जहन्नुम से जन्नत।
है तेरी खुशी जिस भी घर ले चले तू॥

बड़े नासमझ हम ना समझें इशारा।
हिफ़ाजत में अपनी मगर ले चले तू॥

कि कर ही चुके नैय्या तेरे हवाले।
किनारे लगा या भँवर ले चले तू॥

जाग मनवा जाग

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"
जाग जाग जाग मनवा जाग जाग जाग,
नींद ये अज्ञान की तू त्याग त्याग त्याग।
देह गेह में सुलग रही है देख काम –
वासना की आग से बच भाग भाग भाग॥

लोभ क्रोध मोह मद हैं दुष्ट भस्मासुर
भोले भाले भोले शंभू होले तू चतुर।
मोहिनी उमा बनेंगे विष्णु नहीं आज
चेत चेत डस न लें तुझे तेरे ही नाग॥

धर्म चेतना विवेक सच्चे मित्र हैं
भ्रम नहीं भव सिंधु में भँवर विचित्र हैं।
है आग का दरिया न लिपट लपटों में लंपट
माया से रहना सावधान संग नहीं लाग॥

तृष्णा तुझे दौड़ा रही मृग सी हरेक दम
जग मृग मरीचिका से बच ले तू कदम कदम।
वरना तेरा वज़ूद जल्द खो ये जाएगा।
पापों के गर्त में गिराएगा तुझे रँग राग॥

Sunday, January 18, 2009

उद्‌बोधन:आध्यात्मिक

आचार्य संदीप कुमार त्यागी "दीप"

कही संतों की तू, अरे! मान सच ले ।
महाठगनी जगन्माया से बच ले ।।

नहीं भरमा स्वयं को और इसमें ।
जतन ऐसा कोई कर मन न मचले ।।

हरेक भोला भला मासूम चेहरा ।
न जाने कब कुटिलतम चाल रच ले ।।

मूँदके आँख मत विश्वासकर तू ।
मान वो बात जो सच्ची हो जँच ले ।।

नशे में नाचती हर इक जवानी ।
कहाँ बिरला बुढ़ापा है? जो नच ले ।।

कभी ना भूल क्षण भंगुर है जीवन ।
गया हर कर्ण आया जो कवच ले ।।