Wednesday, March 18, 2009

रावण:प्रतिनारायण क्रांतिकारी महाकविता

रावणः प्रतिनारायण
प्रणेता-डॉ सत्यव्रत शर्मा"अजेय"

अगम अगोचर ‘‘अजेय’’ अध्यक्षर जो
उज्ज्वल-उदन्त, उदीरित त्रिभुवन में
मनोरमा वह मणि-मुकुट- विमण्डिता
शारदा असार में भी सार भर देती है।
बुद्धि का प्रसार कर देती है सृजन में
हो के जुष्ट-तुष्ट, पुष्ट करती अपुष्ट को
‘‘सूर’’ को भी दिव्य दृष्टि करती प्रदान है
जिसको भी चाहती है उसको ही पल में
उग्र, ब्रह्म, ऋषि औ सुमेधा बना देती है
किसी को बनाती व्यास, भास, रस-खान है
ऐसी मया-ममता की मूर्ति हंस-वाहिनी,
वाक ब्रह्मरूपिणी को शतशः प्रणाम हैं।

ब्रह्मा के मानसपुत्र पण्डित पुलस्त्य का -
पौत्र, तथा सुविदित वैदिक विचारवान्
विश्रवा का पुत्र, विश्व-विश्रुत विशिष्ट विज्ञ
वेद-शास्त्र ज्ञाता वह परम कुलीन आर्य
ब्रह्म वंश-अवतंस रावण महान था।
विश्रवा की विधिवत् परिणीता, दैत्य-कन्या-
कैकसी की कोख से लिया था जन्म उसने,
अतः निज जाति से पृथक किया उसको
सर्व बन्धु-बान्धवों के साथ, दम्भी द्विजों ने
बिना सोचे समझे कि - ‘‘अंकुर के जन्म में-
बीज की ही प्रधानता होती, न कि क्षेत्र की,
सन्तति के कुल-गोत्र-जाति-विनिश्चय में
मातृ-कुल नही, पितृ-कुल देखा जाता है।
सह न सका था वह घोर अपमान यह
तड़प उठा था व्रणी फणी मणिधर सा,
फलतः तिरस्कृत हो बनना पड़ा था उसे
घोर प्रतिक्रियावादी कुटिल कुलिश सा।
श्रेष्ठ पुरूषों के वह निरख निकृष्ट कर्म

करता था अट्टहास-‘‘हाऽहा हा।’’सतत ही,
निज को जो वीर-धीर मानते थे, उनकी -
गर्जना से तर्जना से करता था वर्जना
इसी लिए वह मानी ‘‘रावण’’ कहाता था।
विधिवत् वह ‘‘वेद विद्याव्रतस्नात’’ था
राजनीति-निपुण, सकल कला-निधि था
चारों वेद, षट् शास्त्र कण्ठस्थ थे उसको
जिससे कि ‘‘दशानन’’ पद उसे प्राप्त था
बढ़ गया इस भांति वह ‘‘चतुरानन’’ से
पूजनीय ‘‘पंचानन’’ और ‘‘षडानन’’से
जिस भांति गुरु से भी गुरु पटु वटु हो,
वट से बृहत् वट-बीज का वितान हो,
उसके समान अद्यावधि वेद-विद्या से-
विद्योतित अनवद्य हुआ नहीं विश्व में
रावण था नाम उस वीर स्वाभिमानी का
चलने से जिसके दहलती यों धरणि-
हस्ति-पग से ज्यों डगमग होती तरणि।
रावण का घोर रौर सुन कर सहसा
विवुध-वधूटियों के गर्भ गिर जाते थे
देखते ही उसकी भृकुटि वक्र, शक्र तक
मेरुगिरि-कन्दरा के अन्दर समाते थे।
स्वीय सिर-सुमन से शिव-समाराधना
कर, हर-गिरि को जो कर पै उठाता था
सालता था कंठ वह दशों दिगपालों के
ध्रुव धैर्यधारी शौर्य-सुयश-शलाका से।

कनक-छरी सी मंदोदरी मय-तनुजा
ललित ललामा वामा सुन्दरी सुरसिका
रावण की रानी मनभावन मनोज्ञ थी,
जिसके समक्ष पानी भरती थी शची भी
जीतने को उस कामिनी के केश-पाश की-
कृष्णता को, जब घन अन्धकार बढ़ता
उदित हो मुख-साम्य-अभिलाषी चन्द्रमा
उसे कर-निकर से करता निरस्त था।
शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, तारकों में सूर्य सा,

वह दिव्य अस्त्रों का प्रयोक्ता, महायोधा था,
कितनी ही बार झेला उसने स्व वक्ष पै
महा वज्र शक्र का, औ वक्र चक्र विष्णुका,
किन्तु हुआ नहीं कभी क्षुब्ध वह अब्धि सा।
इन्द्र आदि देवता परास्त कर उसने
‘‘अमरावती’’ की अमरों से रिक्त बहुधा,
‘‘नन्दन’’ को ‘‘नन्द न’’ बनाया कई बार था,
इसी भांति जा कर पाताल में भी उसने
‘‘भोगवती’’ भोग-नगरीका भोगा भोग था,
‘‘अलका’’ पै करके चढ़ाई यक्षराज से
‘‘पुष्पक’’ विमान किया उसने ग्रहण था।
वह दृप्त-निग्रहीता ‘‘सतत युयुत्सु’’ था,
कपट-कुकर्म-कर्त्तृ-हन्ता ‘‘शत्रुहन्ता’’ था,
कांपती थी उसके प्रताप से प्रकृति भी,
ताप तज देता सूर्य उसके समक्ष था।
देख उसे रुक जाती मरुत की गति थी,
अगवानी करते थे वृक्ष पुष्प-वृष्टि से,

स्वागत में झुक जाते प्रखर शिखर थे,
गर्जन औ तर्जन रहित, नत, पनभरे,
छिड़काव करते थे पयोधर पथ में।
इस भांति उस यशोधन के सुयश ने,
चन्द्रमौलि-भाल पर विलसित गंगा को
अनायास लांघ कर,
दिशा-वधुओं के शशी-मुख को पखारा था।
मूलतः निवासी वह
विद्यमाना आस-पास अचल कैलास के
दर्शनीय दिव्य देवभूमि त्रिविष्टप का।
जीत कर उसने विमातृज कुबेर को
अपहृत उससे की लंक स्वर्ण-सन्निभा
भारत के दक्षिण में जो कि वर्तमान थी
सिन्धु-मध्य अगम त्रिकूट पर शोभिता
दिव्य दीपमालिका से जिसमें दमकते
कनक रचित मणि-खचित भवन थे।
त्रिपुर में अनुपम पुरी वह सर्वथा

उसके ‘‘अजेय’’ कार्य-कलापों की कौमुदी।
परखा है मैंने उसे बुद्धि से, विवेक से,
पूर्वग्रह-मुक्त हो विलोका शुद्ध भाव से,
अतः इस रचना में रावण-प्रशस्ति जो
निकष पै कसी वह रेखा है सुवर्ण की।
भक्त था सशक्त वह शिव स्मरच्छिद का,
पुरच्छिद, भवच्छिद और मखच्छिद का,
जिनकी जटाओं में धवल धार गंग की
हो कर तरंगित सदैव अनुषंग है,
गल में विराजती भुजंग-तुंग मालिका,
धक धक धधकती ज्वाल-माल भाल पै,
ध्वनित दिगन्त कर मधुर मृदंग की-
धिम धिम धिमिम धिमिम धिम ध्वनि से,
संग संग कर सुनिनादित उमंग से
डम डम डिमिक डिमिक डिम डमरू
करते जो नटराज ताण्डव प्रचण्ड हैं।

आकर तरंग में कदापि रस-रंग की,
द्रव में कदम्ब-पुष्प-कुंकुम के द्रव से
करते प्रलिप्त जो कि दिग्-वधू-मुख को,
उनकी ही स्तुति सदा स्वरचित स्तोत्र से
करता था दशानन श्रद्धा और भक्ति से
परम अहम्‍वादी
शम्भु के समक्ष भी न करता था याचना,
कामना थी उसको न वैभव की, सुख की
धन की न, धाम की न, यश की न नाम की।
अतिरिक्त भक्ति के न चाहता था कुछ भी,
स्वयमेव ‘‘जय’’ था अभय था, न उसको-
काल का भी भय था कृपा से महाकाल की।
जनक ने जानकी का स्वयम्वर रचाया
जिसमें बुलाये सब राज-राजेश्वर थे,
रावण भी पाकर निमन्त्रण गया था वहां
पै विदेह-प्रण सुन डूबा था विचार में-
‘‘यद्यपि उठाया मैंने निज भुज-दण्ड से

गिरिजेश-गिरि गेंद सम खेल-खेल में
तो भी सीता-पाणि-ग्रहणार्थ इष्टदेव के -
धनुष को तोड़ना अभीष्ट नहीं मुझको।’’
‘‘लालसा थी हृदय में लगी युग-युग से-
सीता के सुरूप-सिन्धु का मैं मीन बनता।
महनीय शिव-धनु-भंग-प्रण छोड़ कर
यदि मिथिलेश कोई अन्य प्रण करते
सत्य कहता हूँ पूर्ण कर देता उसे मैं
अमृत सहस्रफन से निचोड़ लाता मैं
फोड़ देता धराधर गदा के प्रहार से
तारे आसमान के तुरन्त तोड़ लाता मैं।
मान रखने को किन्तु काम-रिपु-धनु का
त्यागता हूँ अपनी प्रकाम काम-कामना।‘‘
कर यह निश्चय निवर्तमान हो गया
लंकपति निमि-नगरी से निज नगरी
रखकर ध्यान आन-बान कुल-कानि का
लौट जाती जिस भाँति लहर किनारे से।’’

कदाचन एकदा
दण्डक-अरण्य में अरुण मदिरेक्षणा
तरुणी सुकेशी करभोरू कामरूपिणी
शूर्पणखा मोहित हुई थी चन्द्रकान्त सी
चन्द्रनिभ अति अभिराम रामचन्द्र पै,
या कि जैसे फूल पर लुब्ध होती तितली
मुग्ध होती अर्क-प्रभा या कि जैसे मेरु पै।
राम-अनुरूप रूप मान कर अपना
हाव-भाव कर परिदर्शित अनेकशः
स्वयमेव स्वयंवर-रीति-अनुसार ही
उसने विवाह का रखा था प्रस्ताव भी -
‘‘तुम सा पुरुष नहीं मुझ सी न नारी है
जोड़ी मानों विधि ने हमारी ये सँवारी है।’’
तब शील-रक्षण, विचक्षण, महाबली,
सत्य-रत, सत्यव्रत, सत्यसंध राम ने
निज को विवाहित बताया पै असत्य कहा-
‘‘अहहि कुमार मोर लघु भ्राता ‘‘सुमुखि !
इसको ही वरो वरानने ! मृगलोचने !’’

लक्ष्मण के द्वारा उपहास करा उसका,
राघव ने नाम ऊँचा किया रघु-कुल का !
इतना ही नहीं उस पुरुष-ऋषभ ने
श्रुति छू के और नाक पर रख अंगुली
इंगित से, लक्ष्मण यती के कर-कंज से
हन्त हा ! कराई नाक-कान से रहित थी
वह प्रेमाकुला कुल-शील-रूप-गर्विता,
अंग-अंग जिसके अनंग की तरंग थी।
शूर्पणखा चीख पड़ी वेदना से, क्षोभ से-
हाय राम ! आपने अनर्थ कर डाला है,
कहां गया वह राम अन्दर का आपके,
घट-घट में है व्याप्त जो कि प्रति प्राणी के !
सच है ‘‘विनाश काले विपरीत बुद्धि हो।’’
संयत न रह सके यतिवर ! तुम भी
समझ न पाये नारी-जाति के हृदय को
मान लिया मुझे बस कुलटा कुपथगा।
यदि तुम चाहते तो सत् उपदेश से

असत् विचार मम, सत् में बदलते,
शोधन से बना देता जैसे सुधोपम ही-
विष को भी वैद्यवर्य सधे हुये हाथ से।
माना, मैं न ‘‘भगवती’’ बनने के योग्य थी
पर मुझे ‘‘भगिनी’’ तो कह कर देखते,
इस शब्द से ही मिट जाती मेरी वासना
बुझ जाती जिस भांति वह्वि वारि-धार से।
अन्तः मुखी कर देती मैं तो मनसिज को
खिन्नता से, ग्लानि से, हया से, अनुताप से,
भक्ति में बदल देती कलुषित काम को
रावण समान तुम्हें निज बन्धु मानती
टल जाती स्यात् भय-प्रद भवितव्यता !
बाल-बृद्ध-अबला पै हाथ जो उठाता है,
वह बलवान नहीं बल्कि बलहीन है,
गर्व ने तुम्हारा ज्ञान उसी भाँति मेटा है
लाज को मिटाता मद्यपान जिस भांति है।
व्यर्थ तप विद्या बिना विनय-विवेक के

विकृत ये व्यवहार बुध-वृन्द-निन्द्य है।
धिक बलाधिक ! बल अबला पै जतला,
तुमने चलाया क्षात्र-धर्म पै कुठार है,
मेरी नहीं, अपनी ही नाक काटी तुमने
राघव, दिखाया कर-लाघव जो मुझ पै
इससे ये रघुकुल हुआ लघुकुल है।
उनके चखोगे फल बोये विष-बीज जो
मेरी यह प्रार्थना पिनाक-पाणि प्रभु से -
‘‘पर लोक में न नाक-वास मिले तुमको।’’
यह कह शूर्पणखा लौट गई वन में
जहां पर रहते थे रक्ष निजपक्ष के
सुनकर उसकी दुहाई, सैन्य संग ले
रण खर-दूषण ने किया रघुपति से
फूँका तन्त्र-मन्त्र ऐसा मायापति राम ने
राम रूप कर दिया सभी यातुधानों का ,
एक दूसरे को राम समझ-समझ कर
एक दूसरे ने एक दूसरे को मारा था
फिर भगिनी की भयानक दशा देख कर

और सुन कर खर-दूषण-मरण को,
क्रोध और बोध दोनों रावण के मन में
जगे एक साथ ही।
गुंजित दिगन्त कर बोला लंकपति यों -
‘‘आज्ञा बिना जिसकी न पत्ता तक हिलता,
सूर्य भी निकलता न, वायु भी न चलता
रहते हैं सुर-गण- जिसकी शरण में
उस जग-विरावण रावण के संग में
रण रोप कर कौन चाहता मरण है ?
कौन वह अविवेकी नीच नराधम है ?
जिसने कि तनिक न मेरी परवाह की,
भगिनी के अंग भंग कर संग-संग ही
मुझ दशानन का भी किया अपमान है।
कौन है जो खर स्वयमेव निज कंठ में
चाहता चुभोना तीक्ष्ण प्रखर त्रिशूल है।
कौन है जो सिंह- दन्त चाहता है गिनना,
बिना मौत मन्दबुद्धि चाहता है मरना।

‘‘राम में हुआ है व्यक्त या कि तेज विष्णु का
जिसने संहारे खर-दूषण पराक्रमी
चौदह सहस्र दैत्य-सैन्य सह सहसा
करता है दग्ध जैसे अग्नि तृण-राशि को।’’
‘‘यदि वह साधारण नर है तो रण में
रावण के हाथ से अवश्य मारा जायेगा,
नारायण का है यदि अंश तो सवंश ही
रावण उसी के हाथ भव तर जायगा।’’
मुझको चुकाना बैर किन्तु प्रतिदशा में
देनी है चुनौती उस दशरथ-सुत को
क्योंकि अपमान करना है अपराध तो
अपमान सहना भी घोर अपराध है।’’
‘‘जग-कल्पवृक्ष का मैं सुन्दर विहंग हूँ
चखता हूँ कामनानुसार फल इसके,’’
मेरे हाथ एक साथ सर्वथा समर्थ हैं -
कामिनी के कुच, करि-कुम्भ के दलन में।

वेद और शास्त्र का समस्त तत्त्व जानता
ब्रह्मविद्, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्म हूँ मैं ब्रह्म हूँ,
काट नहीं सकता है मुझे शस्त्र कोई भी
अनल भी मुझको जलाने में अशक्त है
डुबो नहीं सकता है मुझको सलिल भी
झकझोर सकता न झंझा का झकोर है,
अभिमान नहीं, यह मेरा आत्मज्ञान है।
अपमान-सहन में सदा असहिष्णु मैं
वरुण-कुबेर-इन्द्र-विष्णु का भी जिष्णु मैं।
‘‘मान-अपमान को समान कैसे मान लूँ
विष और अमृत भी होते कहीं सम हैं ?
अपमान सह कर जीवित जो जग में
जीवित नहीं है वह मनुज मृतक है,
मान के समक्ष प्राण तुच्छ मान कर ही
मानी मान-धन पर प्राण वार देते हैं,
अतः ठेस लगने न दूँगा स्वाभिमान को।’’
‘‘बहिन की नाक काट, हन्त दाशरथी ने
क्षात्र-धर्म-विपरीत किया नीच कर्म है।

उसकी प्रतिष्ठा नष्ट करनी है मुझको,
बदला उतारना है घोर अपमान का।
उसके कुकर्म का चखाऊँ मजा ऐसा कि-
जिसको जीवन भर रखे याद वह भी।’’
‘‘उसने ही झगड़े का किया सूत्रपात है
अतः रक्त-पात-दोषी होगा वही न्यायतः,
अपराध होता न घटित कार्यवाही से
देखा जाता उसमें भी कर्तृ-भाव सर्वदा
पत्थर से दिया जाय ईंट का जवाब तो
अपराध नहीं वह मात्र प्रतिकार है।
यथायोग्य बरतना होता सदा श्रेष्ठ है
शठता का आचरण उचित है शठ से,
कायर के संग में सुहाती नहीं वीरता
साथ में निकृष्ट के निकृष्टता ही ठीक है।’’
यह सोचकर गया रावण स्वयान से
मारीच-सहित द्रुत, पंचवटी वन में।

स्वर्ण मृग-मारीच को लख कर जानकी
त्रिभुवन-सुन्दरी समस्त विश्व-मोहिनी
लुब्ध हुई बालिका सी, बोल उठी राम से-
इस स्वर्ण-हिरण का चर्म मुझे चाहिए।
‘‘सर्वथा स्ववश प्रतिबन्ध-मुक्त ब्रह्मस्पृहा
जाती जिस-जिस ओर, उस-उस ओर ही
विवश मनुज-मन करे अनुगमन है
करे अनुसरण ज्यों तृण समीरण का।
जानते हुए भी स्वर्ण-मृग नहीं होता है
लुब्ध राम दौड़े पीछे कंचन-हरिण के
बस इसी लिए अपहृत हुई जानकी
टाले नहीं टलती है कभी भवितव्यता।’’
राम ने त्वरित पीछा किया स्वर्ण-मृग का
लगते ही बाण वह बोला हाय लक्ष्मण !
भ्रम वश समझ पुकार उसे राम की
लखन भी भेजा वहीं हठ कर सीता ने
सीता-अपहरण का अवसर प्राप्त कर
करने विचार लगा दशग्रीव मन में-
‘‘डरता नहीं हूँ किसी विघ्न और बाधा से

डरता हूँ सदा किन्तु धर्म-मर्यादा से
घर में किसी के घुसना न न्यायोचित है
अतः नहीं उटज के अन्दर मैं घुसता’’
यह सोच अलख जगाई दशानन ने
पंचवटी स्थित राम-कुटिया के द्वार पे-
‘‘योगी तेरे द्वार पै खडा है देवि! भीख दे’’
भिक्षुक के तेज से प्रभावित हो सीता जी
लांघ सीमा-रेखा आई पास भिक्षु योगी के।
प्रकट हो, स्वाभिप्राय कहा दशकंठ ने-
‘‘अबला पै हाथ उठा राम अजवंशी ने
रावण के बल-वीर्य-शौर्य को चुनौती दी।’’
प्रतिकार-भावना से तुमको उठाता हूँ
कोई और कलुषित कामना न मेरी है
जानता हूँ, होता रण-कारण ही दर्श है-
चौथ-चन्द्रलेखा सी परस्त्री-भाल-पट्टी का,
रण का निमन्त्रण ही है ये मेरी ओर से।
युद्ध की पिपासा मिटा देगा रामचन्द्र की,
चन्द्रहास मेरा मणिकान्तिजित धार से।।’’

सीता भयभीता ने स्वगत कहा अग्नि से
तुमको शपथ देव ! मेरे पातिव्रत्य की
अत्रि-पत्नी अनुसूया और अरुन्धती की
छू न सके सिंहलेश मुझ ठगी मृगी को
अतः मुझे अपनी लपट में लपेट लो।
और कहा रावण से-‘‘सावधान, छूना मत
काम-वासना के कीट ! छुआ यदि मुझको
तो तू सत्-अनल में मेरे जल जायगा।’’
हँस कर रावण ने कहा-‘‘शान्त सुन्दरि !
देखो तुम्हें उठाकर यान में बिठाता हूँ
और दिखलाता हूँ मैं तुम्हे यह श्रेयसि !
सत से तुम्हारे, मेरा सत् अत्यधिक है।’’
भुज-व्याल-धृत की यों कह सीता मणि सी,
डाल उसे पुष्पक में चला नभ-मार्ग से।
राह में जटायु मिला वृद्ध वैज्ञानिक था
रावण का प्रतिपक्षी, पक्षी दाशरथी का
आह सुन जानकी की जानकर भेद सब

ललकारा रावण को उसने स्वयान से,
मरने को सिंह पर झपटे मतंग ज्यों।
रावण ने फेंक कर मारा ऐसा अस्त्र कि-
ध्वस्त हो के धरा पर गिरा यान उसका
विक्षत गतायु सा जटायु हुआ सहसा
तड़पा,तड़पता ज्यों पक्षी पंखहीन हो।
रोती हुई जानकी को साथ लिए, रावण ने
लंका में पहुंच कर कहा माल्यवान से-
‘‘सचिव ! चुकाया प्रतिकार है बहिन का
काट ली है नाक मैने सूर्यवंशी राम की,
बाधक बनूंगा नहीं किन्तु भूल कर भी
पितु-वच-पालन के व्रत में मैं उसके।’’
‘‘शक्ति-युक्त होने से समान वाक-अर्थ के
सर्वथा अभिन्न कहलाते जिस भांति है
अर्धचन्द्र-मौलि, अर्धकूट, अर्धनारीश्वर,
अर्धकेतु, अर्धकाल, मेरे इष्ट शिव जी,
इसी भांति सीता-राम-युग्म यह युक्त है,
रामचन्द्र चन्द्र है तो जानकी चकोरी है

राम-सहधर्मिणी है, राम-अर्ध-अंगिनी,
पतिव्रता, सती, साध्वी है विदेह-नन्दिनी,
स्नेह-हीन, विरह-विदग्ध दीप-शिखा सी
हन्त ! धूलि-धूसरित मन्दप्रभ मणि सी
दाशरथि-विटप से होकर वियुक्त जो
वल्लरी सी विगलिता वसुधा-विलुण्ठिता
कीलक से कीलित प्रभावहीन ऋचा सी।’’
चाहता हूँ तदपि, न कुण्ठिता हो मुझ से
चाहता हूँ धर्म सदा फूले-फले विश्व में
चाहता हूँ राम का न वन-वास भंग हो।
अत एव यह वन-वासिनी, अभागिनी
भवन में मेरे रखने के नहीं योग्य है,
रखता हूँ इसे मैं अशोक-वन-प्रान्त में
शोक जहां व्यापेगा न लोक-परलोक का
सर्वथा अशोक ही रहेगी यह वहां पै,
रक्षित रहेगी रक्ष-नारियों से सर्वदा
कोई भी सतायेगा न किसी भांति इसको
स्वयमपि करूंगा न बल का प्रयोग मैं।
यक्ष-रक्ष सुर-नर-किन्नर विलोकें तो
राक्षसता मुझ रक्षराज द्विजराज की।‘‘

इसके अनन्तर,निरन्तर वियोगिनी
सीता-सुधि लेने हेतु राम की अनुज्ञा से
पार कर पथ के अपार पारावार को
आये हनुमान थे अशोक उपवन में
रक्षक-सहित अक्ष-वध कर कपि ने
वह वन-वाटिका भी नष्ट भ्रष्ट कर दी
भ्रातृ-शोक से हो मर्माहत इन्द्रजित ने
बांध लिया वानर को विद्युत के वेग से।
ब्रह्म-पाश-बद्ध रामदूत हनुमान को
रावण-समक्ष कर कहा मेघनाद ने-
इस क्रूर कपि ने उजाड़ी बन-वाटिका
मार दिया ‘‘अक्ष’’ लक्ष रक्षक-सहित हा !
इसे अब आप यथोचित दण्ड दीजिये।

रावण ने कहा-‘‘यह यद्यपि अक्षम्य है
क्योंकि अपराधी यह पुत्र-हत्या-काण्ड का
पर, दौत्य-कर्म में नियुक्त मान इसको
मुक्त करना ही युक्ति-युक्त हूँ मैं मानता
विभीषण आदि की भी सम्मति है ऐसी ही,
अतः कपि-पूँछ पै लपेट रूई, तेल से-
तर कर आग लगा कर इसे छोड़ दो
जिससे कि यह मुग्ध दग्ध स्वयमेव हो।’’
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‘‘सागर का सेतु बांध लिया कपिदल ने’’
सुन यह समाचार स्वीय गुप्तचर से
रावण के मुख से निकल पड़ा सहसा-
‘‘वननिधि, नीरनिधि, तोयनिधि, जलधि
उदधि,पयोधि, सिंधु बांधा शाखा-मृगों ने !’’
इसका प्रभाव नहीं किन्तु कुछ मुझ पै
क्यों कि खग हों न वीर लांघने से सिन्धु के।
पार कर सागर को नर और वानर वे
मेरे भुज-सागर में डूबेंगे अवश्य ही।
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निज जय-हेतु सेतु-बन्ध के निकट ही
रघुकुल-केतु चाहते हैं शिव-स्थापना
यह जान कर महादेव के अनन्य भक्त
रावण के हृदय में जागी भव्य भावना -
‘‘जानकी के बिना वन-वासी किस भांति से
अर्चना करेगा पूर्ण मेरे महादेव की,
मेरे इष्ट मेरे अर्च्य, मेरे वन्दनीय की
समाराधनीय, पूजनीय, महनीय की-
यजन अपूर्ण रह जाय नहीं शिव का
अतः सीता जी को लेके चलूं पास राम के।’’
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‘‘निज-सव्य भाग में दे स्थान सती सीता को
राम! करो पूर्ण यज्ञ’’ कहा लंकपति ने।
सुनकर सहसा स-हित मित भारती
सामने विलोक सिय-संग त्रिदिवारि को
हत-प्रभु राम थे चकित चित्रलिखे से,
देखते ही सूर्य-वंश-अवतंस राम को
द्रवित सी हुई सीता, सूर्यकान्तमणि सी।
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कल्पना से परे इस घटना अघट से
चेतन थे जड़, जड़ चेतन समान थे।
नम्र हो के रावण से कहा यह राम ने -
ब्रह्मा बन मेरा यज्ञ पूर्ण करा दीजिए:
रिपु-अनुरोध मान, अपने विरोध में-
आयोजित यज्ञ भी
पूर्ण था कराया प्रज्ञ रावण पुरोधा ने
परम उदार, महाप्राण, यशोधन ने
हो कर प्रसन्न दिया आशिष भी शत्रु को-
‘‘चिरजीवी, पूर्णकाम, राम! तुम जयी हो।’’
‘‘यदि तुम चाहो तो लो रखो पास अपने
परम पुनीता सीता को भी सीतानाथ हे !
क्योंकि मेरा मनचीता
सीता अपहरण का लक्ष्य हुआ पूर्ण है।’’

धन्यवाद करके प्रदान कहा राम ने-
‘‘रावण ! उठाई सीता तूने छल-बल से
होगा बल मुझ में तो लौटा लूंगा इसको,
दलकर दानवों का दल, पद-तल से
समर में होगी पहचान बलाबल की
बुरे की-भले की, अनजान की - सुजानकी,
शूरता-अशूरता की, तेरी-मेरी जान की
जानकी नहीं है यह, बाजी जान-जान की।
जिस भांति होता मुक्त सूर्य, राहु-ग्रास से,
उसी भांति होगी मुक्त सीता तव पाश से,
व्याल से विमर्दित अनिन्द्य वन-फूल सी,
सीता को सहर्ष अंगीकार तब करूंगा।’’
बोला तब रावण यों कर घन-गर्जना-
‘‘प्रत्युत्तर पा कर तुम्हारा मैं प्रसन्न हूँ,
अंगीकार करता हूँ रण की चुनौती को,
विग्रह में विजय न तुमको मिलेगी, क्योंकि
द्यौ को नहीं, गौ को दुहने से दूध मिलता।’’
सर्वथा सुरक्षित रहेगी परिणाम तक
राम ! मेरे पास सीता धरोहर तुल्य ही।
हर्षकारी नहीं मुझे धर्म-धर्षकारी जो
धन-धान्य धरा-धाम, धूल के समान है।

दूरदर्शी रावण लगा यों फिर सोचने
समाहित चित्त हो स्वकीय सौध-कक्ष में-
‘‘होगा ऐसा युद्ध जैसा ‘‘भूतो न भविष्यति’’
भूतल पै भारी हलचल मच जायगी
ध्वस्त हो के धराधर धरणी में धंसेगे
उथलेंगे जल-थल उथल-पुथल से,
खर-तर-धार, धुआंधार, धूम-केतु से
सर-सर-सर शर छूट कर कर से
कर देंगे हतप्रभ सूर्य को भी नभ में।’’
किन्तु युद्ध युद्ध है
चलता पता न कुछ हार और जीत का।
जानता हूँ अज-वंशी राम नहीं अज है,
राम वह राम, योगी रमते हैं जिसमें,
विपदा-विराम, वह लोक-अभिराम है।
सम्भव पै इससे भी प्राप्त पराभव हो,
किन्तु पराभव भी विभव होगा मुझको,
भव की कृपा से भव-भय मिट जायगा,

भुक्ति से मिलेगी मुक्ति, मुझे युद्ध-युक्ति से।’’
‘‘होंगे हवि, होंगे हवि, महाहव-हव में
सुर-नर वानर समस्त यक्ष-रक्ष भी,
सब कुछ होगा स्वाहा, आहा! इस आग में
पुरजन, परिजन, सकल स्वजन भी,
कुछ न बचेगा, भली भांति हूँ मैं जानता,
तो भी यह चाहता हूँ-
हम रहें या न रहें नाशवान विश्व में
पर, लंका पर रहे राज्य निज कुल का
अत एव मुझको
चलनी पड़ेगी चाल कूट राजनीति की।’’
‘‘अपने से विमुख करूंगा विभीषण को
लगता है सत में सतत चित जिसका,
लंक में कलंक से रहित वही एक है,
पदाघात कर उसे यहां से भगाऊँगा;
वह अपमानित हो मानी बन्धु मुझ से
राम की शरण में अवश्य चला जायगा
और न बचेगा कोई जब निज वंश में
तब एकमात्र बस वही बच पायगा।

मुझ से विरोध कर, होगा प्रिय राम का
क्योंकि राजनीति में
मित्र ही कहाता वह शत्रु का जो शत्रु है।
अत एव अन्त में
अभिषिक्त हो कर श्री राम के कराब्ज से
पायगा अनुज ‘‘लंकपति’’ पद पायगा।’’
और यह योजना सफल रही उसकी,
अनुकूल अवसर पर सिंहलेश ने
विभीषण से भी भेद रख कर गुप्त ही
दुत्कार कर और मार कर लात से
जाने दिया घर-द्वार छोड़कर उसको
शत्रु की शरण में।
जाने दिया तन-मन-धन और जीवन भी
जाने दिया सब कुछ, लंक नहीं जाने दी।
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फिर दोनों दल डट गये युद्ध-भूमि में,
नायकों ने किया निज नयनों की तुला से
एक दूसरे को तोलने का उपक्रम था।
बोले रामचन्द्र देख भारी रिपु-दल को-
‘‘एक चन्द्र बहुत है तम के विनाश को।’’
राम-सैन्य निरख कहा यों दशकण्ठ ने-
‘‘तारापति-मुखी सेना मानो मुग्ध वामा है
नील आदि नव नील चिकुर हैं जिसके,
अंगद है अंगद ललित भुज-लता का
कपि-दल-अविकल कलकल कोलाहल
सुमधुर नूपुर की झंकृति के तुल्य है।
देख कर जिसको है पुलकित अंग-अंग
उठ रही मेरे मन मौज मनसिज की।’’
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राम और रावण के प्रथित कटक में
कट-कट पड़ते विकट भट भूमि पै
रुंड-मुंड-झुंड, भग्न तुंड से वितुंड के
बहते थे निराधार धार में रुधिर की।

महाक्रुद्ध रावण ने एक दिन युद्ध में
घोर मेघ-नाद कर
अष्टघंटा, महास्वना, शक्ति शत्रु-घातिनी
तोल कर फेंकी यति लक्ष्मण के वक्ष पै,
करती दिगन्त को ज्वलन्त ज्योति-पिंड सी,
दीप्यमाना, महाद्युति, विद्युत के वेग से
धंस गई उर में उरग-राज, जिह्व सी,
धराशायी, लथ-पथ रक्त से लखन यों
लगते थे लाल-लाल उस काल मानो कोई-
पन्नग से परिगत अदभुत नग हो,
या कि छिन्न पादप हो पुष्पित पलाश का,
या कि रज्जु-मुक्त रक्त रंग की पताका हो,
या कि तुंज-भंग तुंग मेरू गिरि-शृंग हो।
गतवीर्य, गततेज, राम शरदाभ्र से,
विरह-मलीन, दीन, जल-हीन मीन से,
लखन की लख न सके थे व्रण-वेदना,
सहसा अचेत हुये इस भ्रातृ-शोक से,
सूर्य छिपने से यथा पद्म श्री-विहीन हो।
किन्तु कालान्तर में ही स्थितप्रज्ञ-अग्रणी
रामचन्द्र उर-मणि लक्ष्मण-वियोग में,
प्रवाहित वारिज-विलोचनों के वारि से
होकर सचेत, लगे करने विलाप यों-
हन्त ! वृन्त-विकसित कुसुम को काल ने
काल से ही पूर्व कर डाला छिन्न-भिन्न है
भग्न मनोरथ अब मग्न हुआ जाता हूँ
ओक-लोक-शून्य महाशोक के समुद्र में
जिस भांति करि-अपहृत कुवलय का
मसृण मृणाल-तन्तु लय होता जल में।
‘‘मुझ सा अभागा नहीं कोई इस जग में,
भार्या हुई अपहृत, भृत्य हुआ मृत है,
मैं तो सब भाँति हुआ हाय! असहाय हूँ
हाय ! मैं तो लुट गया इस भरे विश्व में,
किस भांति जननी को मुख दिखलाऊँगा
जीते जी तो तड़पूँगा, बिलखूँगा, रोऊँगा,
हा हा ! मैं तो मर कर भी न चैन पाऊँगा।
मेरा साथ छोड़ कर भ्रात चला गया है
सदा साथ रहता था जो कि प्रतिबिम्ब सा,
किन्तु अब मैं भी साथ उसका निभाऊँगा,
जिस मार्ग गया वह उसी मार्ग जाऊँगा,
क्षमा सीते ! क्षमा बन्धो ! क्षमा मित्र ! क्षमा मां !
क्षमा कर देना सब मुझ हतमणि को।’’
देख दुःख-हर को दुखित जामवन्त ने
धीरज बंधाया,कहा-‘‘लक्ष्मण अ-मृत है,
संज्ञा-हीन हुआ यह शक्ति के प्रभाव से,
शंका मत मानिये तनिक भी अनिष्ट की,
उपचार इसका त्वरित ही विधेय है।’’
राम की अनुज्ञा प्राप्त कर जामवन्त ने
किया फिर निवेदन अंजनीकुमार से -
‘‘जाओ मित्रवर ! तुम लाओ तत्काल ही
रावण के राज्याश्रित, सुहत्, पीयूषपाणि,
वैद्यराज, मनीषी सुषेण वानरेन्द्र को।
कर देता जीवित जो प्रायः मृतप्राय को’’
औषधाद्रि-दक्षिण शिखर-भवा, सुप्रभा
शल्य-हारी ‘‘संजीवनी’’ औषधि-विशेष से।’’
बाण के समान हनुमान गये लंक में
संग चलने को कहा भिषक सुषेण से,

अवगत करा उसे अपने अभीष्ट से।
सुनकर बहुशः विनय वायु-सुत की
रावण से मांगी अनुमति नत वैद्य ने।
मेघ के समान दशानन तब गरजा-
‘‘मत जाओ, मतजाओ, जाने भी दो, जाने दो।
जाने भी दो पास उस क्षयी रामचन्द्र के
दिशा-बन्धुओं को, काली साड़ियां तिमिर की-
पहिन-पहिन कर,
होने भी दो अनुभूति वेदना की उसको
दैन्य-दुःख-दावा-दाह, अशनि-निपात की,
शेष हुये निज बन्धु शेष के विछोह में
वेदना-विनिर्मित विशेष शेष-पाश से
वेष्टित हो, उसको भी होने मोहाविष्ट दो।
डसने दो तुम उसे सुधियों के सांपों से,
होने भी दो हर्ष हमें शत्रु के विलापों से,
डूबने दो, डूबने दो साथ में ही तारों के
‘‘चन्द्र’’ सम चमकीले अवध के तारे को
राम के सहारे को।
होने भी दो निबटारा जीत और हार का,
बदला उतरने दो प्रिय पुत्र ‘‘अक्ष’’ का।
लक्ष्मण के जीवन में होने न प्रभात दो,
उसके वियोग में ही तड़प-तड़प कर,
मर जाने भी दो बिना मारे रिपु राम को।’’
‘‘ठहरो, परन्तु प्राणाचार्य ! जरा ठहरो,
रावण अहम्मन्य आज हुआ धन्य है,
जिसके समक्ष हुआ वायु-पूत दूत द्वारा
दया-सिन्धु स्वयमेव दया का भिखारी है।
काल के विपर्यय से देखो इस विश्व में
बद्धमूल वृक्ष भी उखड़ जाते जड़ से।
ध्वस्त हो के धराधर धंस जाते धरा में
अस्त होते धन-जन, वैभव समस्त ही,
प्रलय में होते लय सूर्य और शशि भी,
रोशनी ‘‘दिये’’ की पर फिर भी न बुझती।
इसलिए जाओ तुम उसे प्राण-दान दो,
धर्म है हमारा रण-आहत की सुश्रूषा,
आहत में होता नहीं भेद रंचमात्र भी

आहत तो आहत है, अपना पराया क्या
उससे सहानुभूति दैविक विभूति है।’’
रावण की आज्ञा पा सुषेण गया सुख से
साथ हनुमान जी के राम के शिविर में,
संजीवनी-स्वरस से स्वस्थ किया शेष को।
अमर समर छिड़ गया फिर उनमें
रावण ने कहा-राम बनते हो बलवान
नाक-कान काटने से अबला अकेली के
अथवा अतुल बलशाली वीर बाली को-
मारने से छिप कर छली छल-छद्म से
समकक्ष शूर के समक्ष हुए आज हो
शक्ति है तो झेलों मेरे दुर्निवार वार को।
रावण का रौद्र रूप देख कर रण में
हुआ कर-लाघव भी राघव का व्यर्थ था,
ऐसे वह त्रस्त जैसे राहु-ग्रस्त चन्द्र हो
रावण के वार का निवारण अशक्य था,
वासुकि से विष-युक्त स्वर्ण-पुंख बाणों से
वानर हो विद्धअंग करते वमन थे
अंगदादि संग नल-नील जामवन्त भी,
किञिचत थे चिन्तित से हन्त ! हनुमन्त भी
देख दृश्य दारुण ये दुःखित थे देवता।
वंशज की वेदना से व्यथित तरणि भी,
डूबने लगे थे तब पश्चिम पयोधि में,
पीला पड़ा ‘‘चन्द्र’’ जैसे फल हो खजूर का,
हतप्रभ नभ की भी छाती हुई छलनी,
रुदन मचाने लगे द्विज-गण चहुँधा।
कहा विभीषण से यों नष्टकाम राम ने-
लगता है अब न मिलेगी मुझे जानकी
वल्लभा, कपोतग्रीवा, प्रतनु, घटस्तनी,
मधुकर-निकर-चिकुर, शुक-नासिका,
पिक-कलकण्ठ,वक्र मनसिज-धनु-भ्रू
कुन्द-पुष्प दन्त वाली, इन्दुमुखी, मैथिली
स्वर्ण-वर्णा, तरुणी, अरुण मदिरेक्षणा,
कामिनी, कदलि-जंघा, मत्त गज-गामिनी
क्यों कि महादेवी, महालक्ष्मी, महाकालिका,
दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, मंगला, कपालिनी,
अष्टभुजी, शंख-चक्र-गदा-पद्म-भूषिता,
कुलिश-कृपाण-पाणि, धनु-वाण-धारिणी,
तरल त्रिशूल-वाही, तूर्ण तिग्म तैजसी,
दुराराध्या, ध्यानसाध्या, विन्ध्यगिरि-वासिनी,
दुःखहरा, सुखकरा, प्रकृति, नारायणी,
नीलकंठ-प्रिया, निराकारा, तारा, शारदा,
भ्रामरी, भवानी, भीमा, धूम्रा, पाप-नाशिनी,
जिसके कि भाल पर भासमान भानु सा,
चम-चम चमकता कुन्दन-किरीट है,
मणिराजि जिसके यों शीश पर सोहती,
शोभित ज्यों नील नभ मध्य नखतावली,
जिसके कि कंठ में
झिलमिल-झिलमिल सुरसरि-धार सा
विमल धवल रजताभ शुभ्र हार है,
वह चंडवती, चंडा, मुंडा, चंडि, चंडिका,
महाशक्ति रण-रता रावण की ओर से,

कर रही ध्वस्त है समस्त मम सैन्य को,
मम मन्त्र-पूत अगणित अस्त्र-शस्त्र को।
कर असु रक्षित, सुरक्षित हो सर्वथा
राजता है रावण यों महाशक्ति-अंक में
शोभित कलंक हो ज्यों मंजुल मयंक में,
अत एव वध अब उसका असाध्य है
और असुकर है।’’
धिक बल, धिक शक्ति, धिक पराक्रम है
माया का सहारा अब अन्तिम सहारा है।’’
यह सोचकर, रूप रख कर शिव का
मायापति राम गये रावण के हर्म्य में
जब वह प्रस्तुत था स्तुति-करणार्थ ही
भव्य भगवान भूत-भावन भवेश की।
रावण ने देखते ही अर्चना की उनकी
और कहा हँस कर- ‘‘जानता हूँ सब मैं-
प्रभो ! आप कौन ! यह भी हूँ पहिचानता,’’
मेरे इष्ट शिव जी का रूप रख आये हो

अत एव सब भांति मेरे वन्दनीय हो।
राम ! यदि आते आप अपने ही रूप में
तो भी इसी विधि पूजा आपकी मैं करता
क्यों कि मेरी दृष्टि में तो भेद नहीं रंच भी
विष्णु में विरंचि में या शिव में या राम में।
बोलो किसलिए आये, चाहते क्या मुझसे
आपके अभीष्ट को अवश्य पूरा करूंगा।
मेरा यह व्रत कोई आये यदि द्वार पै
उसको हताश कभी जाने नहीं देता मैं
लौटने न देता कभी खाली हाथ किसी को
प्राण भी दे याचक का मान रख लेता मैं।
क्यों कि चल चंचला सा तन-मन धन है,
रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्श पलमात्र के
अतल जलाशयों का जल सूख जाता है,
बन जाते नभ-चुम्बी भवन भी वन है।
जगत में होता अन्य सब गतिमान है,
रहता सदैव स्थिर एकमात्र दान है।‘‘

लज्जित हो राम ने कहा कि ‘‘आप धन्य हो,
वीर अग्रगण्य, भक्त शिव के अनन्य हो,
ज्ञानी, ध्यानी, मानी, अभिमानी, महादानी हो।
बन कर वामन मैं हो कर विवश ही
आया द्वार आपके,
मानता हूँ अपने को हतभाग्य विश्व में
अपना अभीष्ट साधनार्थ, जो कि सर्वथा
आप जैसे शिष्ट का भी चाहता अनिष्ट हूँ
चाहता हूँ पूछना कि प्राण कहां आपके
चाहता हूँ हन्त हा ! दुरन्त अन्त आपका।’’
‘‘राम ! मेरी मृत्यु नहीं आपके है बस की,
पत्थर को तोड़ नहीं सकता प्रसून है,
थर-थर कांपते हैं मुझसे दिगन्त भी
अन्तक भी मेरा अन्त कर नहीं सकता
क्योंकि अखिलेश के अनन्त अनुग्रह से
यम पर नियम सदैव रहा मेरा है।
आपने की याचना परन्तु मेरे सामने
अतः करता हूँ मैं निवेदन स्व मृत्यु का


कल रणक्षेत्र मध्य निश्चित मुहूर्त में
प्राणायाम क्रिया से मैं प्राण ब्रह्मरन्ध्र में
अपने ले जाऊंगा
व्यक्त होंगे लक्षण विशिष्ट मेरे तन में
जाने देना तब स्वर्ण-समय न हाथ से
मन्त्र-अभिषिक्त ब्रह्म-अस्त्र द्वारा मुझ पै
करके प्रहार निज लक्ष्य पूरा करना।
बनकर केवल निमित्तमात्र तुम यों
लूट लेना दशकण्ठ-वध के सुयश को।’’

‘‘लक्ष्य सिद्ध होने पर इस धरातल में
देखता न कोई भी विजेता के कपट को
जय पर आधारित होते गुण-दोष हैं
निश्छल कहाते जेता जीत कर छल से।’’
चिन्तन में डूबे हुये इस भांति मार्ग में
सर्वोपाधि- विनिर्मुक्त समुद कुमुद से
अगोचर, सर्वव्यापी, पुरुष पुराण वे
रामचन्द्र लौट गये अपने शिविर को,
जान कर भेद रिपु रावण-मरण का।

अगले दिवस कहा राम को अगस्त्य ने-
‘‘वीरवर ! रण में प्रयाणपूर्व,पहले-
विजय के हेतु करो पूजा तुम सूर्य की,
क्षार-क्षार करता जो पातक-पहाड़ को,
हरता अखर्व गर्व सर्व अन्धकार का
अतल वितल रसातल तलातल का
निज कर-किरणों से करता भरण जो,
वही ब्रह्म, वही विष्णु, वही महादेव है,
वही स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, यम, सोम है,
वही वायु, वही वह्वि, वही वारि-निधि है,
वही है गभस्तिमान, अग्निगर्भ, सविता,
वही है हिरण्यरेता, वही दिवाकर है,
वही विभु, तमोभेदी, महातेजा, मित्र है,
नमः पद्मबोधाय च, नमो लोकसाक्षिणे
तमोघ्नाय, शत्रुघ्नाय, नमो दिव्यवर्चसे।’’
तीन बार जप इस सूर्य के स्तवन को
रण के समस्त उपकरण सहित ही,
मातलि से प्रेरित सहस्र-अक्ष-रथ में

चढ़कर चले राम नव जलधर से।
बज उठे ढफ ढोल दुन्दुभि मृदंग संग
अंग-अंग भरते उमंग रण-वाद्य थे,
प्रांगण में रण के पहुँचते ही क्षण में
भिड़ गये परस्पर क्रुद्ध दोनो सिंह से
परम कठोर घोर धनुष-टंकोर से,
बधिर विवर्ण हुये भूधर अकर्ण भी
अनन्वय राम और रावण का युद्व था,
खलबली मच गयी लोक-परलोक में
शैल बन-कानन सहित डोली मेदिनी।
प्रथम प्रहार किये अ-विराम राम ने
भड़क उठा था क्रोध रावण का इससे
जिस भांति आहुति से अनल धधकता।
यद्यपि विराट वज्रकाय दशानन को
राम-बाण लगते थे मृदु पद्म-नाल से
प्रत्युत्तर देने के लिए ही तो भी उसने
वार कर एक अनिवार्य पुंखशर का
रथ-ध्वजा काट डाली महाबाहु राम की।

हार को निहार राम पड़ गये सोच में
क्यों कि यत्न व्यर्थ होते भाग्य के समक्ष यों
मिट जाती पानी पर खचित लकीर ज्यों।
‘‘झूठ है कि केवल रगड़ने ही मात्र से
काष्ठ से प्रकट होती अग्नि इस विश्व में,
झूठ है कि खोदने से यहाँ धरातल के
विमल सलिल-धार धरा से निकलती।’’
देखा फिर रावण की ओर क्षुब्ध राम ने,
लक्षण विलक्षण विलोक याद आ गया
कथन पुलस्त्य-पौत्र नित्य सत्यसंघ का
उठा लिया अविलम्ब लम्बबाहु राम ने
दिव्य अभिमन्त्रित अमोघ ब्रह्म-अस्त्र को
गौरव में जो कि मेरू-सदृश विशाल था
जो कि वज्रसार, महानाद, भारी भीम था,,
पावक सी जिसके फलक की चमक थी।
छोड़ दिया रावण पै वेद-प्रोक्त विधि से
गुंजित दिगन्त कर वह घोर रौर से।

क्षय कर रावण का लय हुआ भूमि में।
धनु-बाण-स्रस्त,
रिक्त-हस्त द्रुत वेग से
ध्वस्त हुआ दशानन भूमि पर रथ से
छत्र सा, नक्षत्र सा कि वज्र-हत वृत्र सा।
ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मलीन हुआ यह कह कर-
‘‘मेरे जीते जी न कर पाये हो प्रवेश राम
प्रकट स्व वेश में कदापि मेरे देश में
किन्तु अब आपके ही जीते जी मैं जाता हूँ
बिना रोक-टोक सीधा आपके ही लोक में।’’
एक जगमग ज्योति, रावण के तन से
सहसा निकल कर सूर्य में समा गई
देख यह दृश्य हुये विस्मित विवुध भी।
रोने लगा विभीषण हो कर विषण्ण, ‘‘हा !
चला गया सेतु हन्त ! नीतिवान नरों का
चला गया धीर धर्म-धुरन्धर हन्त हा !
बल चला गया बलधारियों का विश्व से,

गत हुआ जगत से वीरता का भाव है।
सूर्य-चन्द्र नखत हुये हैं हतप्रभ से
रावण के जाने से अंधेरा छाया लोक में।’’
हा ! हा ! किया महा-वृक्ष सम दशानन का -
भंजन, प्रभंजन समान दाशरथि ने,
जिस पर द्विज किया करते बसेरा थे,
वासव भी जिसके समक्ष शवमात्र था,
मुझ सा अभागा भला होगा कौन भूमि पै
जिसने विरोध किया बन्धु का विपत्ति में
मर क्यों न गया था मैं हाय ! जन्म लेते ही
क्षमा कर देना तात ! अपने अनुज को।’’
राम ने कहा कि-‘‘विभीषण ! धैर्य धारिये
रावण का यथाविधि क्रिया-कर्म कीजिये,’’
‘‘यह धीर, महावीर, महाबलवान था,
यक्ष रक्ष नर और वानर की शक्ति क्या,
देवता भी रण में न करते थे सामना,
यह शक्ति-साहस में जग से अजेय था,
श्रेय और प्रेय सदा ध्येय रहे इसके।

इसने किये है यज्ञ आदि आर्य-कार्य भी,
षटकर्मसावधान यह द्विजराज था,
अमर रहेगा यह सुयश-शरीर से
ग्रस नहीं सकता है काल कभी इसको
वीर-गति-प्राप्त यह सर्वथा अशोच्य है
‘‘ममाप्येष यथा तव’’यह पूजनीय है,
सर्वथा प्रशंसनीय और वन्दनीय है।
मानते हो यदि तुम नारायण मुझको
तो ये प्रतिनारायण मेरा प्रतिभट है
उसी भांति मुझ में समाहित ये सर्वदा,
निहित सदैव है सुवास जैसे पुष्प में
मुझसे कदापि नहीं सत्ता कम इसकी
सत्ता जिस भाँति होती ज्ञान की अज्ञान से,
होती अन्धकार से प्रकाश की प्रखरता,
सगुण से निर्गुण की जिस भाँति महिमा,
सापेक्ष महत्ता वैसे रावण से राम की।

होता नहीं अन्तर विशेष सिन्धु-बिन्दु में
गुण और धर्म की है दोनों में समानता।
हम दोनों समराशि अद्वय, अभिन्न है
राम और रावण का ‘‘रा’’ वर्ण समान है,
अतः हटाकर मोहावरण को मन से
अन्तिम प्रणाम करो ‘‘प्रतिनारायण’’ को।
धर्मविद्! तुमने जो मेरी की सहायता
उससे ही जयश्री मिली है मुझे रण में
अत एव होकर प्रसन्न, स्वस्थ चित्त से
लंका का समस्त राज्य तुमको हूँ सौंपता।’’
‘‘काल बलवान वही कर्ता-भर्ता-हर्ता है,
काल-वश वीर-गति पाई दशकंठ ने।
अतः नित्य सत्य विभु महाकाल, सर्वदा
विश्व-परिपालन ‘‘अजेय’’ कर विश्वतः।’’

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