Thursday, December 23, 2010

खुद की तलाश

जिस्म तो बस लिबास है यारों।

मुझको खुद की तलाश है यारों।।

 

खुद ही खुद का वज़ूद पहचानूँ।

खुद से ख्वाहिश ये खास है यारों॥

 

फलसफ़े औरों के कुबुल नहीं

गहरी खुद ही में प्यास है यारों

 

आजमाइश बग़ैर इल्म ए कुतुब

होता कोरी कयास है यारों ॥

 

जो ना तदबीर ए तजुर्बात करे

शख्स वो जिंदा-लाश है यारों॥

 

किस पयम्बर ने दकियानूसी का

ना किया पर्दाफाश है यारों॥

 

लाऊँ इमान क्यों इमामों पर

दिल में कुरआन ए खास है यारों॥

Friday, August 6, 2010

स्मारिका २०१०

हिन्दी राइटर्स गिल्ड की स्निग्ध काव्य कला कौमुदी में कनाडा का साहित्यिक जगत आम आदमी से जुड़ता जा रहा है। हिन्दी राइटर्स गिल्ड की अबतक की उपलब्धियों को गिनाना मेरा उद्देश्य नहीं है, क्योंकि कनाडा में रहने वाले सभी हिन्दी कलमकारों ने हिन्दी राइटर्स गिल्ड से अनुप्रेरित होकर जो सजग सक्रियता विशेषतया इस वर्ष दिखायी है वह अपने आप में हिन्दी राइटर्स गिल्ड के सशक्त अस्तित्त्व का तुमुल नाद है।अहिन्दीभाषी साहित्यकारों,पुस्तकालयों,एवं समय समय पर हिन्दी राइटर्स गिल्ड की मुख्यधारा के मीडिया (अखबार टी.वी,रेडियो) में भी दर्ज़ उपस्थिति दर्शाती है कि गिल्ड के कर्णधार सभी कवि,लेखक,कहानीकार, गीतकार,नाटककार व ग़ज़लकार अपनी अपनी विधाओं के विदग्ध या वज़नदार जानकार हैं।
जैसा कि सभी जानते हैं कि हर किसी को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए एक ज़मीन तथा सिर उँचा करने के लिये एक आसमान की जरुरत पड़ती है वैसे ही हम सभी साहित्यकारों को भी अरसे से एक ऐसे
धरातल की तलाश थी जिस पर खड़े हो कर हम विश्व के साहित्य के आकाश में अपना सिर आत्मगौरव के साथ उँचा उठाये रक्खें।हिन्दी राइटर्स गिल्ड ही वो संस्था साबित हुई जिसने हमें बड़े सलीके व इल्मोहुनर से हिन्दी साहित्य के जमीनो आसमां से परिचित कराया है।
ऐसी जागरुक संस्था को उन्नत शिखर पर बनाये रखने के लिये अपना तन मन धन आदि से हर संभव सहयोग देना हमारा नैतिक कर्त्तव्य सा बन जाता है।
जैसा कि सभी को मालूम ही है कि हिन्दी राइटर्स गिल्ड की वार्षिक स्मारिका का प्रकाशन आगामी महीनों में हो रहा है।जिसमें आप अपनी मौलिक रचना पसंदीदा विधा में टाइप करके भेज सकते हैं,टंकण संबन्धी कोई समस्या हो तो हिन्दी राइटर्स गिल्ड के संपर्क में आ समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
स्मारिका के प्रकाशक व संपादक मंडल ने मुझे जिम्मेदारी सौंपी है कि मैं आप सभी कविश्रेष्ठों से आपकी चुनिन्दा एक एक कविता इकट्ठी करूँ।साहित्यिक गुणवत्ता की दृष्टि से सर्वोत्तम आप कृपया अपनी एक एक रचना EMAIL—smarikahwg@gmail.com par भेज कर कृतार्थ करें।
कविता के अलावा कहानी,लेख,संस्मरण,गीत, ग़ज़ल,आदि सभी तरह की रचनाएं पूर्वोक्त email पर ही भेजें।साथ में अपना वर्तमान फोन या इमेल का पता भी प्रेषित कर दें जिससे कि आवश्यकता पड़ने पर हम आपके संपर्क में रह सकें।
साहित्यानुचर
संदीप कुमार त्यागी
दूरभाष-६४७ २८२ २५२९

Friday, June 4, 2010

मुक्तक इश्किया कोरी जवानी!

चटख रंग प्यार का कोरी जवानी पर चढ़ा ऐसा।
बदन सुन्दर सलोना सोनजुही सा खिला ऐसा।
सुनहरी हो उठी सुबहा, बसन्ती रूप का सागर,
मचल उट्ठा दिवाना दिल हुआ है इश्किया ऐसा॥

उनींदी शबनमी अँखियाँ कनखियों में वो बतियाये।
हैं लब पुरसुर्ख़ मस्ती से मगर फ़िर भी वो शर्माये।
मिलन की रात की ले ख़ास खबरें चाँद सा चेहरा
बड़ी आहिस्ता आहिस्ता सनम चिलमन को सरकाये।

Tuesday, May 25, 2010

Bursts freely as romance.

Oh my mystic majesty I have trust in you
to transcend all strife of life into dance.
To take a step on steep I do seek just in you.
Confidence boosts bliss bursts freely as romance.


A wonderful wish Flaps like fish in heart’s lake
Absolute fun under new sun chirps at morn.
Their long tails as Fluffy puppies shake
Oh sweetheart! in my heart love songs born.

Your bluish eyes clear like sky of happy springs.
Inner beauty blooms looms pure love.
To touch all heights so strong yours wings.
You’ve caught thy eye while you flying above.

Like an angel of love you are always around.
I know where you live I find you surround.

Saturday, May 8, 2010

माँ


माँ
परमपिता के ध्यान में टिके न लाख टिकाये।
माँ की ममता में मगर मन आनन्द मनाये

होने को भगवान भी, बड़ी कौन सी बात।
“माँ होना” भगवान की भी पर नहीं बिसात॥

मन से किस सूरत हटी मूरत माँ की बोल।
बच्चे से बूड़े हुए माँ फिर भी अनमोल॥

दूह दूह कर स्वयं को किया हमें मजबूत।
कैसे माँ के दूध का कर्ज़ उतारें पूत॥

माँ की ममता की अरे समता नाही कोय।
क्षमता माँ की क्या कहूँ प्रभु भी गर्भ में सोय॥

अनुपमा माँ


अनुपमा माँ !
सात समुद्रों से भी ज्यादा
तेरे आँचल में ममता है।
देखी हमने सारे जग में,
ना तेरी कोई समता है॥

सौम्य सुमन सरसिज के हरसें
सरसें स्नेह सरोवर नाना।
सुप्रभात की अनुपमा सुषमा,
सदा चाहती है विकसाना॥
सुधा स्पर्श सा सुन्दर शीतल
सुखद श्वास प्रश्वास सुहाना।
कल्पशाख से वरद सुकोमल
कर अभिनव मृणाल उपमाना॥
स्वर्ग और अपवर्ग सभी कुछ,
माँ की गोदी में रमता है॥

हो शुचि रुचि पावन चरणों में,
तेरा करूँ चिरन्तन चिन्तन।
शीश चढ़ा दूँ मैं अर्चन में,
अर्पित कर लोहू का कण कण॥
मणिमय हिमकिरीटिनी हेमा
माँग रहे वर तव सेवक जन।
शुभ्रज्योत्स्ना स्नात मात तव
वत्स करें शत शत शुभ-वंदन॥
सप्त सिन्धु का ज्वार तुम्हारे
पद पद्मों को छू थमता है॥

Monday, April 26, 2010

its romance to groove yourself.

It’s all up to you that you in light your life.
Or throw yourself in the fire of desire to burn.
All alone day & night you can fight with all strife.
A candle of light house waits for deep one’s return.

To come across of this cosmic dark sea
You may be notice a little light, from inside
What will indicate divine path very clearly.
Toward peace proceed with passion and pride

So what? If no one is beside behind or with you
The journey of joy can’t you enjoy with inner one.
Like sun with no companion shines brings new view.
You too Oh Deep Certainly unique! Knower of your depth is none.
How? Pure Love improves yourself you’ve yourself to prove yourself.
Movement of life is a dance its romance to groove yourself.